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जस्टिस नरीमन पर क्रिमिनल केस करने वाले रशीद खान और अन्य के समर्थन में सुप्रिम कोर्ट के इतिहास में सबसे जादा वकीलों का वकालतनामा.


रिटायर्ड जस्टिस रंजन गोगोई की अपराधिक साजिश उजागर सुप्रिम कोर्ट के जस्टिस रोहींटन नरीमन और विनीत सरण पर केस करने वाले रशीद खान पठाण, ऍड. निलेश ओझा और ऍड. विजय कुर्ले के समर्थन में सुप्रिम कोर्ट के हजारो वकीलो ने अपना समर्थन दिया है.
ऑल इंडिया एस. सी., एस. टी एंड मायनॉरिटि लॉयर्स असोसिएशन, सुप्रिम कोर्ट एंड हाई कोर्टस लिटीगंटस असोसिएसन, इंडियन बार असोसिएशन, मानव अधिकार सुरक्षा परीषद ने लिखित रुपमे चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया श्री. शरद बोबडे, राष्ट्रपती श्री. रामनाथ कोविद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर दोषी जजेस रोहिंटन नरीमन, विनीत सरण, अनिरुद्ध बोस, रिटायर्ड जस्टिस दीपक गुप्ता और वकील सिद्धार्थ लूथरा, मिलिंद साठे, कैवान कल्यानीवाला के खिलाफ एफ. आय. आर. (FIR) दर्ज करने, सीबीआय (CBI) को जाच आदेश देने तथा इन जजेस को जाच पूरी होने तक सुप्रीम कोर्ट की किसी भी कारवाई में भाग लेने की अनुमति नहीं देने की मांग की है.
ज्ञात हो की इससे पहले भी 10 जनवरी 2020 को 'Suo Moto Contempt Petition 02 of 2020 Re: Vijay Kurle and others मामले में सुप्रिम के कोर्ट करीब ५०० वकीलों ने रशीद खान पठान और अन्य दोनों के समर्थन में वकालतनामा पेश किया था. कोर्ट हॉल में जगह न होने की वजह से उन्हें बाहर रहना पड़ा था फिर भी करिब १४८ वकिलो के नाम कोर्ट के आदेश में आ पाए थे और वकीलों की इतनी भीड़ देख कर जस्टिस दीपक गुप्ता ने समय न होने का बहाना देकर सुनवाई टाल दी थी. 
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में आज तक ऐसे कंटेप्ट के मामले में इतने वकील हाजिर नहीं हुए थे. यह बात स्पष्ट करती हैं की, वकीलों में भ्रष्ट और अन्यायकारी जजों के खिलाफ कितना आक्रोष है.
क्या है मामला :- 
१२ मार्च २०१९ को न्या. रोहिंटन नरीमन और न्या. विनीत सरन ने बिना किसी सुनवाई के आधार पर सीधे एक ख्रिशचन अल्पसंख्यांक समुदाय के वकील ऍड. मैथ्यू नेदुमपरा को कोर्ट अवमानना का दोषी करार दे दिया. इस बात से वकील संगठनो में रोष व्याप्त हो गया.
इस देश के संविधान के मुताबिक कोई भी व्यक्ति को दोषी करार देने से पहले न्यायिक प्रक्रिया नुसार उसे नोटिस देना, आरोप निश्चित करना, बचाव का मौका देना, केस लड़ने के लिए वकील देना बंधनकारक है.
अजमल कसाब जैसे आतंकवादी को भी सभी सुविधा दी गयी थी. लेकिन एक अल्पसंख्यांक समुदाय के वकील को व्यक्तिगत दुष्मनी के चलते संविधान के खिलाफ जाकर दोषी करार दिए जाने के खिलाफ इंडीयन बार असोसिएशन के महाराष्ट्र और गोवा के अध्यक्ष ऍड. विजय कुर्ले और दुसरे एक मामले में मानव अधिकार सुरक्षा परिषद् के राष्ट्रीय सचिव रशीद खान पठान ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास शिकायत दर्ज की.
उन्ही दो जजो ने दुसरे एक मामले मे एक आरोपी को बचाने के लिये पद का दुरुपयोग कर गलत आदेश पारीत करणे को लेकर की थी उसमे भी जस्टिस नरिमन का भ्रष्टाचार ओर कानुन की समझ ना होणे के सबुत दिये गये थे. 
इस शिकायत के अधार पर जस्टिस रोहिंटन नरीमन और जस्टिस विनीत सरण पर क्रिमिनल केस और जज के पद से बरखास्तगी तय मानी जा रही थी. ज्ञात हो की किसी भी व्यक्ती के गलत तरीके से सजा देने वाले जज को ७ साल की सजा का प्रावधान आय.पी.सी (I.P.C.) की धारा 220, 219 आदि में किया गया है. और सुप्रिम कोर्ट की संपत्ती का दुरुपयोग खुदके व्याक्तिगत स्वार्थ के लिए करनेवाला जज आय.पी. सी. की धारा 409 के तहत आजीवन कारावास की सजा का हकदार हैं.
उस कारवाई से बचने के लिए जस्टिस नरीमन ने एक अपराधिक साजिश के तहत उनके सहयोगी वकील मिलिंद साठे और कैवान कल्यानिवाला के हाथो एक पत्र बनवाकर खुद ही उसका संज्ञान लेकर खुद आरोपी रहते हुए खुद की ही केस में आदेश पारित कर शिकायतकर्ता को नोटिस जारी किया.
कानून के मुताबिक आरोपी जज को खुद के केश में आदेश पारित करने का अधिकार नहीं है. ऐसी ही गलती करने वाले जस्टिस कर्णन के खिलाफ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने डॉक्टरो की कमिटी बनाकर कही वो पागल तो नही है इसकी जाच करने की आदेश दिए थे. और बाद मे जस्टिस कर्णन ६ महीने के लिए जेल भेज दिया था.
तबके चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के साजिश में शामिल होने के सबुत 
जब १२ मार्च को जस्टिस नरीमन द्वारा वकिल के खिलाफ गैरकानूनी आदेश पारित किये गए थे तब सजा पर सुनवाई के लिए २७ मार्च २०१९ की तारीख तय की गयी थी.उस अत्याचार को रोकने के लिए इंडियन बार असोसिएशन द्वारा दिए गए २० मार्च २०१९ के पत्र पर रंजन गोगोई ने कोई कारवाई नही की और जस्टिस नरीमन को पद का दुरूपयोग करने दिया.
इस वजहसे जस्टिस रंजन गोगोई Re:M.P. द्विवेदी ( Dwivedi ) AIR 1996 SC 2299 मामले में बनाये गए कानून के हिसाब से कोर्ट अवमानना के दोषी है.
बाद में जब रोहिटन नरीमन ने केस से खुद को अलग किया तब उस केस में नयी पीठ (बेंच) बनाने के लिए मामला तब के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के पास आया. 
          मामले की सुनवाई १० अप्रैल २०१९ को रखी गयी थी. लेकिन कुछ वरिष्ठ जजों ने नरीमन की गलती की वजह से केस लेने से मना कर दिया और CJI रंजन गोगोई को सलाह दी की मामले को ठंडे बस्ते में डाल दो नहीं तो जनता और वकील में आक्रोश फ़ैल जायेंगा और नरीमन के खिलाफ कारवाई करनी पडेगी. जस्टिस गोगोई ने मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया. 10 अप्रैल को मामला बोर्ड पर नही आया.  जबकी चारो उत्तरवादी कोर्ट मे पहुच चुके थे. बाद में कई महिने गुजर गए पर कोई भी समजदार, ईमानदार और वरिष्ठ जज केस लेने को तैयार नही हो रहा था. रशीद खान पठान, ऍड. निलेश ओझा ने खुद सुप्रीम कोर्ट के संबंधित असि. रजिस्ट्रार से और अन्य अधिकारीयों से मुलाकात की तो उन्हें बताया गया की २०१० का ऍड. प्रशांत भूषण को कंटेम्प्ट केस अभीतक प्रलंबित है इसलिए उनके केस के बाद आपका केस सुनवाई  को जायेगा.
उसके बाद में २८ ऑगस्ट २०१९ को अॅड. फली नरीमन के देशद्रोह के अपराधों के बारे में और पी. चिंदबरम को गिरफ्तार होने की खबर दैनिक साहसिक में प्रकाशित हुई. इससे नरीमन गैंग घबराकर तुरंत हरकत में आगई और चीफ जस्टिस रंजन गोगोई से मिलकर फली नरीमन को बचाने के लिए जस्टिस दीपक गुप्ता से बात कर २०१० के साल का ऍड. प्रशांत भुषन का मामला प्रलंबित होते हुये भी 2019 के मामले को बोर्ड पर लिया और सुनवाई २ सितम्बर २०१९ को तय की.
  यह बात गौर करने लायक है सुप्रीम कोर्ट की महिला कर्मचारी के शोषण मामले में की गयी साजिश में जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस नरीमन को भी आरोपी बनाकर गंभीर करवाई के लिए ऑल इंडिया एस. सी. , एस. टी एंड मायनॉरिटि लोयेर्स असोसिएशन के चेयरमैन एड. विवेक रामटेके द्व्यारा २७ मई २०१९ को राष्ट्रपति के पास दर्ज केस नं. PRESEC/E/2019/10201 अभी भी प्रलंम्बित है.
उस केस की Prayer Clause (1) इस प्रकार है.
‘‘1. Direction for immediate consideration of  serious greviences of “Women in Criminal Law Association” dated 8th May, 2019 and direction  as per Constitution Bench Judgment in K. Veeraswami Vs. Union of India (UOI) and Ors.1991 (3) SCC 655, Raman Lal (High Court Judge)Vs. State 2001 Cri.L.J.800, Justice Nirmal Yadav case 2011 (4) RCR (Cri.) 809.  to register F.IR. Against Shri. Ranjan Gogoi, Chief Justice of India, Smt. Rupanjali Gogoi, Justice Arun Mishra, Justice Sanjeev Khanna, Justice Rohinton Nariman &  Justice Deepak Gupta and Ors. under section 409, 217, 218, 219, 192, 466, 471, 474, 167, 166, r/w 120 (B) & 34 of Indian Penal Code by taking advice of competent, impartial Judges of Hon’ble Supreme Court as mentioned in para “60” of K. Veeraswami’s case 1991 (3) SCC 655,with direction to do investigation..’’
ऐसे में उसी आरोपी जस्टिस दीपक गुप्ता को दुसरे आरोपी नरीमन का केस देना अपने आपमें यह साबित करता है की कैसे सुप्रिम कोर्ट की संपत्ती का दुरूपयोग आरोपियों को बचाने के लिए किया गया.
बाद में उस जस्टिस दीपक गुप्ता ने आरोपी जस्टिस नरीमन और वकिल सिध्दार्थ लूथरा, मिलिंद साठे को बचाने के लिए झूठे सबुत बनाकर और संविधान पीठ के आदेशो के खिलाफ जाकर दो वकील ऍड . निलेश ओझा, ऍड विजय कुर्ले और मानवधिकार कायकर्ता श्री. रशीद खान पठाण को कोर्ट अवमानना की सजा सुनाई.
इस बारे में ऍड. निलेश ओझा ने न्यूज़ चॅनेलो को दिए अपने साक्षात्कार में जस्टिस दीपक गुप्ता की अकार्यक्षमता और उनके द्वारा किए गये गंभीर अपराधोकी जानकारी दी.
जब वकीलों और नागरिको को जस्टिस दीपक गुप्ता के गुनाहों की जानकारी मिली तो वकीलों तथा नागरिकों में आक्रोश छा गया.
कई वकील संघटनो, गैर सरकारी संघटन, एन.जी.ओ ने  अपनी ओर से लिखित रूप में राष्ट्रपति, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया, प्रधानमंत्री आदि को निवेदन देकर दोषी जजेस के खिलाफ तुरंत करवाई की मांग की है.
आशा है की जल्द ही मामले की जांच पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया आर.एम. लोढ़ा, सी. बी.आय, आय.बी. की विशेष जाच टीम (SIT) बनाकर सच्चाई देश के सामने लाकर दोषियों को दंड दिया जाएगा.


मुरसलीन अ. शेख 
सचिव- सुप्रीम कोर्ट अँड. हाई कोर्ट लिटीगंटस असोसिएशन ऑफ़ इंडिया (SCHCLAOI)
मो.न.9175431583

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